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आधुुनिक जीवन शैली एवं आयुुर्वेद सिद्धान्त

आधुुनिक जीवन शैली एवं आयुुर्वेद सिद्धान्त
हमारा जीवन औद्योगिक युग से सूचना के युुग में प्रवेश कर रहा हैं। युगों का परिवर्तन ही कार्य करने के तरीको या खान- पान ,रहन -सहन का परिवर्तन ही आधुनिकिकरण कहलाता हैं। आधुनिक समय मे मनुष्य की दिनचर्या सोना -जागना, खान- पान, रहन -सहन पहलेे के मुुकाबले बहुत बदल गया है अब कोई भी बह्ममुहुर्त में नही उठता, सूर्य निकलने से पहले नही नहाता, सुर्योेदय के समय जल नही चढाता, मौसम के अनुुसार सब्जियॉ नही खातेे, सुर्यास्त सेे पहले रात्रि भोेजन नही करते, रात मेे जल्दी नही सोते, बहुुत कम लोग बचे है जो अब इन तोर-तरीको को अपनाते हैं जिन्हे अब पुराने खयालात या बुजुुर्गो की श्रेणी मे गिना जाता हैं। आधुनिक होने की धुन मे इतने मशगूल हो गये की आप स्वस्थ रहने केे सिद्धान्त को ही भूल गये। आधुनिक समय में आपका रहन- सहन, खान- पान ,ओढने-पहनने का तरीका बदल सकता है पर आपने तो सिद्धान्त को ही पीछे छोड दिया जिसका परिणाम यह हुआ कि हॉस्पिटल डाक्टरों की सख्ंया बढने के साथ साथ मरीजो और बीमारीयों की संख्या भी तेजी से बढने लगी।
किसी भी कार्य की शर्त होती हैं कि आपका तरीका अलग हो सकता है परन्तु सिद्धान्त (Principle) नही बदलेगा, परन्तु आधुनिकता के चक्कर में सिद्धान्त ही बदल बैठे। वास्तव मेें बहुुत से लोगो ने तो यह विचार भी नही किया होगा कि वह बीमार क्यो हो रहें हैं, बस बीमारी का उपचार करानेे की दौड मे लगे पडेे है ना कि उसे रोेकने की दौड मेे।
आयुुर्वेद एक ऐेसा विज्ञान है जिसका उद्वेश्य
1 ”स्वस्थस्य स्वास्थ्य रक्षणम“् (स्वस्थ मनुष्य को बीमार होने से बचाना)
2“आतुरस्य बीमार प्रशमन” (बीमार मनुुष्य के रोग कोे ठीक करना)
आयुुर्वेद नेे पहलेे हमेशा चतमअमदजपवद को प्राथमिकता दी है इसीलिए इस जमानेे की कहावत भी आयुर्वेद की भाषा ही बोेलती हैं ”चतमअमदजपवद पे इमजजमत जींद बनतमण्“ बीमारी होने से रोेकने मे ही समझदारी हैं एक बार बीमारी हो जायें तो अब कह नही सकते कि अब इसकोे ठीक करने मे कितना समय लगेगा या यह बीमारी अब शरीर केे किस किस अंग को प्रभावित करेगी
आयुर्वेद के अनुसार जीवन शैली एवं उसका महत्व
1.सुुबह बह्ममुहुर्त मे उठना चाहिये। जो लोग देेर से या सूर्य निकलने के बाद उठते हैं उनका पाचन व मलक्रिया कदापि ठीक नही रह सकती। वह लोग भूख न लगना, बदहजम, उल्टी आना या एसीडिटी के अकसर शिकार रहते है।
2.सुबह उठकर जो लोग पानी की जगह चाय/काफी पीतेे हैं या नाश्ते मे चाय, काफी, ब्रेड टोस्ट इत्यादि का प्रयोग करते हैं उन्हेे एसीडिटी के साथ साथ कब्ज व गैस आदि की समस्या हो सकती हैं और जो लोग सुबह नाश्ते मे फल, दुध, चना, मेवे व प्राकृतिक भोेजन करते हैं उनके शरीर में विटामिन, प्र्रोटीन, कैल्शियम, आयरन आदि की मात्रा का सामान्य स्तर बना रहता है और उन्हे पाचन केे रोेग नही होते।
3.आजकल लोग इतनेे व्यस्त रहते है कि उनके पास व्यायाम करने का समय नही हैं परन्तु बीमार होकर डाक्टर के पास चक्कर काटनेे का समय है। और बार-बार बीमार होकर एवं केमिलकयुक्त दवा खाकर शरीर को खराब कर लेते है। इसीलिए समय, धन, व शरीर की सलामति के लिए 30-40 मिनट व्यायाम रोजाना करना जरूरी है। ताकि आप स्वस्थ रह सको।
4.आयुर्वेद के अनुसार काजल आखों मे रोजाना डालना चाहिये ताकि हमारी आखों की गन्दगी रोजाना निकलती रहे और आखें कमजोर न हो, और चश्मे की भी जरूरत न पडे।
5.आयुर्वेेद के अनुसार “अणुतेल” (आयुर्वेदिक तेल) को नाक केे दोनो रन्ध्रो में रोजाना डालना चाहिये ताकि मनुष्य आखांे, नाक (ेपदनेद्ध, दिमाग की विभिन्न परेेशानियांे से बचा रहे।ं यह तेेल पूूरे साल दिन मे खाना खाने से पहले डालना चाहिऐ, यह अनिद्र्रा व विभिन्न मानसिक बीमारीयांे को भी ठीक करता है व उन्हे दूूर भी रखता है।
6.आयुुर्वेेदशास्त्र के अनुसार प्रत्येक को कषैला, कडवा व तीखा स्वाद वाला दातुुन करना चाहियेेे इससे दंात साफ होेने के साथ साथ मुुखशुुद्धि, मनशुुद्धि, उल्टी आना व मुुख का स्वाद खराब होना आदि परेशानियों दूर होती है, मीठा पेेस्ट व दातुन करनेेे सेे दंात तोे साफ होे जाते है परन्तु स्वाद, उल्टी आना, सुुबह भूख न लगना आदि परेशानियो मे कोेेई सहायता नही मिलती इसीलिए आयुुर्वेद केई चीजो को साथ लेेकर चलता हैं।
7.सिर पर तेल मालिश करनेे से सिर दर्द मे आराम होता है, बालो के पकने, गिरने, झडने आदि कोे रोकने मे सहायक ह,ै इससे निद्रा भी अच्छी आती है एव विभिन्न मानसिक विकार होनेे सेे रोेेकता है।
8.आयुर्वेदशास्त्र के अनुसार रोजाना कान मे तेल डालने से कान के रोग, गर्दन केेे रोेग, क्ष्बमतअपबंस ेचवदकपसलजपेद्वए विभिन्न जबडे के रोेग, मे बहुत फायदा पहॅुुचता है।
9.रात मे सोेतेे वक्त पैर के तलवो मे तेल की मालिश करनेे से पैर केे रोेग, स्याटिका, तलवो का फटना एवं आखांेे की रोेशनी मे भी फायदेेमन्द होेता है।
10.आयुर्वेद शास्त्र मेे खाने की मात्रा ( कितना खाना चाहिये ) के बारेे मेे निर्देश दियेे है, इसके अनुसार किसी भी मनुष्य को पेट का 1/3 हिस्सा ेवसपक विवकए 1/3 हिस्सा सपुपक विवक ंदक अन्तिम 1/3 हिस्सा खाली रखना चाहिये (जैसा की बडेे बुुजूूर्ग बोलते है कि खाना हमेेशा भूख सेे थोडा कम खाना चाहिये )े
1/3 हिस्सा खाली रखनेे का कारण है कि खाने केे पश्चात लीवर, पेेट आदि मे जो केेमिकल (मद्रलउमध् इपसमद्ध निकलते है वह आसानी से मिल जायंे, अगर पेट बिल्कुल फुल भरा रहेगा तोे पेेट ठीक से (उवअमउमदजद्ध क्रिया नही कर पायेगा, जो वह खानेे में केमिकल मिलाने के लिए करता है। जोे लोग बिल्कुुल फुुल पेट भरकर खातेे हैं उनका पेट (उवअमउमदजद्ध क्रिया नही कर पाता है जिसकेे कारण केमिकल खाने मे न मिलकर पेट की दीवार केे आसपास ही इकटठा हो जाता है, जोकि आगेे चलकर एसीडिटी (हंेजतपब नसबमतद्ध जैसी बीमारीयांे का कारण बन सकती है।ं
शरीर को बीमार होने से बचाने के लिए आयुर्वेदिक जीवन शैली का होना जरूरी है यह वही तरीका है जो आपको बीमारी से बचाने के साथ-साथ आपकी बीमारी को भी ठीक करने मे लाभदायक है।ं

वैद्य अक्षय चौहान
नोएडा

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